बैंकिंग एवं वित्तीय सचेतना – भाग 91

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26 May, 2015

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बैंकिंग जागरूकता,


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KV-Kamath-NDB-2015

1) भारत के किस प्रसिद्ध बैंकर को ब्रिक्स (BRICS) देशों के शंघाई (Shanghai) में स्थापित किए जा रहे न्यू डेवलपमेण्ट बैंक (New Development Bank) के पहले अध्यक्ष (President) के रूप में नियुक्त करने की घोषणा 11 मई 2015 को की गई? – के.वी. कामथ (K.V. Kamath)

विस्तार: 67-वर्षीय के.वी. कामथ भारत के कुछ सबसे प्रतिष्ठित बैंकर्स में से एक हैं। वे अप्रैल 2009 में आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) व प्रबन्ध निदेशक (MD) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे और उन्हें ICICI बैंक का गैर-कार्यकारी अध्यक्ष (non-executive chairman) नियुक्त किया गया था। वहीं ब्रिक्स से सम्बद्ध 5 देशों – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने पिछले वर्ष जुलाई में 100 अरब डॉलर की पूँजी से एक विकास बैंक स्थापित करने का निर्णय लिया था जिसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी के नियंत्रण वाली अंतर्राष्ट्रीय विकास बैंकिंग व्यवस्था का विकल्प उपलब्ध कराना है। नवम्बर 2014 में ब्राज़ील में हुए ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस प्रस्तावित बैंक का नाम न्यू डेवलपमेण्ट बैंक (NDB) रखने का सुझाव दिया था जिसे सदस्य देशों ने स्वीकार किया था। तब यह निर्णय भी लिया गया था कि इस बैंक का मुख्यालय चीन की वाणिज्यिक राजधानी के रूप में विख्यात शंघाई (Shanghai) में बनाया जायेगा तथा इसका पहला अध्यक्ष भारत से होगा इसके बाद अध्यक्षों का चुनाव ब्राज़ील और रूस से (क्रमश:) किया जायेगा। NDB बैंक के अध्यक्ष का कार्यकाल 5 साल का तय किया गया था और इस प्रकार के.वी.कामथ 5 साल तक इस पद पर रहेंगे।


Credit-Card-2015

2) भारत में क्रेडिट कार्ड्स (Credit Cards) की संख्या दिसम्बर 2014 के अंत में फरवरी 2010 के किस अहम आंकड़े को पार करने में सफल हुई है जिसे बैंकिंग क्षेत्र में क्रेडिट-कार्ड के संकटकाल के पहले का समय माना जाता है? – 2 करोड़

विस्तार: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा हाल ही में जारी आंकड़े के अनुसार भारत में क्रेडिट कार्डों की कुल संख्या दिसम्बर 2014 के अंत में 20.29 मिलियन (यानि लगभग 2.03) करोड़ के आंकड़े तक पहुँच गई है। इस प्रकार यह संख्या 2 करोड़ के उस मनोवैज्ञानिक आंकड़े को फरवरी 2010 के बाद पहली बार पार करने में सफल हुई है। उल्लेखनीय है कि 2010 के बाद के समय को भारतीय क्रेडिट कार्ड क्षेत्र के लिए बहुधा संकटकाल माना जाता है क्योंकि इस दौरान देश में क्रेडिट कार्डों की संख्या में तो बेतहाशा वृद्धि हुई थी लेकिन अधिकाधिक लोगों को क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराने की बैंकों की कोशिश के चलते तमाम ऐसे लोगों को क्रेडिट कार्ड उपलब्ध करा दिए गए थे जो इसका भुगतान करने की क्षमता नहीं रखते थे। इसके चलते तमाम बैंकों को भारी नुकसान हुआ और बाद में क्रेडिट कार्डों के वितरण में काफी सख्ती की गई। लेकिन अब क्रेडिट कार्ड की संख्या में जो वृद्धि दर्ज की गई है उसे स्वस्थ वृद्धि माना जा रहा है। बैंकिंग विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा होने के पीछे कई कारण हैं जैसे – हाल के समय में ई-कॉमर्स क्षेत्र में दर्ज बढ़त, ऑनलाइन खरीददारी में क्रेडिट-कार्ड की लगातार बढ़ती स्वीकार्यता तथा ई-बैंकिंग संरचना का मजबूत होना। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सिर्फ क्रेडिट-कार्ड की संख्या ही नहीं बढ़ी है बल्कि इसके द्वारा किया जाने वाला खर्च भी काफी तेजी से बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि दिसम्बर 2011 में जहाँ क्रेडिट-कार्ड के द्वारा कुल 8,532.6 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे वहीं दिसम्बर 2014 तक यह राशि दोगुने से अधिक बढ़कर 17,437.1 करोड़ रुपए तक पहुँच गई थी।


3) मंगलौर में मुख्यालय वाले कॉरपोरेशन बैंक (Corporation Bank) ने हाल ही में महाराष्ट्र के उस सहकारी बैंक का विलय अपने में कराने के एक प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है जिसका बेहद खराब प्रदर्शन के चलते वर्ष 2013 में RBI ने बैंकिंग लाइसेंस निरस्त कर दिया था। इस सहकारी बैंक का नाम क्या है? – रुपी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड

विस्तार: रुपी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (Rupee Co-operative Bank Limited) का मुख्यालय पुणे (महाराष्ट्र) में है तथा तथा ये भारत के सबसे पुराने कोऑपरेटिव बैंकों में से एक है। महाराष्ट्र भर में इसकी 36 शाखाएं हैं तथा इसका संचित घाटा 652 करोड़ रुपए है। वर्ष 2013 में इसके बढ़ते घाटों और हानिकारक ऋणों (bad debts) की अधिकता के चलते भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने इसका बैंकिंग लाइसेंस निरस्त कर दिया था तथा इसके लेन-लेनों पर निगरानी लगा दी थी। इसके अलावा इसका संचालन RBI के द्वारा नियुक्त प्रशासक (Administrator) के हाथ सौंप दिया गया था। तब कोऑपरेटिव बैंक ने घोषणा की थी कि वह इस बैंक का विलय अपने में कराने का इच्छुक है और इसके लिए इसने इस बैंक से तमाम वित्तीय जानकारियाँ मांगी थी। इन सब की वृहद समीक्षा करने के बाद कॉरपोरेशन बैंक ने हाल ही में घोषणा की कि अब वह इसका अधिग्रहण कर विलय अपने में कराने का इच्छुक नहीं है। माना जा रहा है कि रुपी कोऑपरेटिव बैंक के खस्ताहाल को देखते हुए कॉरपोरेशन बैंक ने यह निर्णय लिया है। इस निर्णय से रुपी बैंक का भविष्य एक बार पुन: अधर में लटक गया है और अब इसके चलते लग रहा है कि इसको बंद करने (liquidation) के अलावा RBI के पास कोई अन्य चारा शेष नही है। उल्लेखनीय है कि एक समय पंजाब नेशनल बैंक और इलाहाबाद बैंक ने भी रुपी बैंक का अपने में विलय कराने में रुचि दिखाई थी लेकिन फिर उन्होंने अपने आपको इस से बाहर कर लिया।


4) निजी क्षेत्र के फेडरल बैंक (Federal Bank) ने 18 मई 2015 को क्रेडिट कार्ड क्षेत्र (credit card segment) में अपने कदम बढ़ाते हुए अपना पहला क्रेडिट कार्ड लाँच कर दिया। फेडरल बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के किस बैंक के साथ क्रेडिट कार्ड क्षेत्र में उतर रही है? – भारतीय स्टेट बैंक (SBI)

विस्तार: यह पहला मौका है जब फेडरल बैंक ने क्रेडिट कार्ड क्षेत्र में पदार्पण किया है। इसके लिए बैंक ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के साथ गठजोड़ किया है। बैंक का लक्ष्य पहले साल में अपने 1.5 लाख ग्राहकों को क्रेडिट कार्ड प्रदान करना का है। पहले चरण में बैंक ने दो प्रकार के कार्ड जारी किए हैं – प्लेटिनम (Platinum) तथा गोल्ड एन मोर (Gold’ N More), जो वीज़ा (Visa) प्लेटफॉर्म पर जारी किए गए हैं तथा इनके अलग-अलग शुल्क तय हैं। उल्लेखनीय है कि फेडरल बैंक भारत में निजी क्षेत्र के बड़े बैंकों में शुमार है और इसका मुख्यालय केरल के कोच्चि (Kochi) में है। अक्टूबर 2014 के अंत में इसकी देश भर में 1200 से अधिक शाखाएँ और 1400 से अधिक एटीएम थे।


5) मई 2015 के प्रारंभ से नेशनल पेमेट्स कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (National Payments Corporation of India – NPCI) ने अंतर-बैंक एटीएम लेन-देन (inter-bank ATM transactions) के लिए वसूली जाने वाली स्विचिंग फी (Switching Fee) को 50 पैसे घटा दिया है। इसके बाद की स्विचिंग दर कितनी हो गई है? – 45 पैसे प्रति लेन-देन

विस्तार: अभी NPCI तक अंतर-बैंक एटीएम लेन-देन के लिए प्रति लेन-देन 50 पैसे स्विचिंग दर के रूप में वसूलता था। अब यह दर 45 पैसे प्रति लेने-देन हो गई है। उल्लेखनीय है कि 2011 तक द्वारा वसूली जाने वाली यह दर 1 रुपए प्रति लेन-देन थी तथा 2011 में इसे घटा कर 50 पैसे किया गया था और तबसे अत तक यही स्विचिंग दर वसूली जा रही थी। NPCI द्वारा स्विचिंग दर को घटाए जाने का एक प्रमुख कारण एटीएम लेने-देन में हुई तेज वृद्धि है जो पाँच साल पहले के आठ करोड़ प्रति माह के स्तर से बढ़कर वर्तमान में 27 करोड़ प्रति माह तक पहुँच गई है। उल्लेखनीय है कि यदि एक बैंक का खातेदार किसी दूसरे बैंक से एटीएम से लेन-देन करता है तो खातेदार बैंक को दूसरे बैंक को 20 रुपया ट्रांन्ज़ेक्शन शुल्क (transaction fee) के रूप में देना पड़ता है। इसके अलावा पहला बैंक NPCI को इस लेन-देन के लिए स्विचिंग चार्ज भी देना पड़ता है जो अब 45 पैसा प्रति एटीएम लेने-देन हो गया है।


6) केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने 19 मई 2015 को उस महात्वाकांक्षी स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (Gold Monetisation Scheme) का मसौदा प्रस्ताव (Draft) सार्वजनिक किया जिसके तहत देश में लोगों के घरों में पड़े लगभग 20,000 टन सोने को निकाल कर उसका सदुपयोग करने की कोशिश की जायेगी। इस मसौदा प्रस्ताव को अब सार्वजनिक कर इस सम्बन्ध में सम्बद्ध पक्षों को आम लोगों की राय मांगी गई है। स्वर्ण मुद्रीकरण योजना के द्वारा मुख्यत: क्या किया जायेगा? – इस योजना के तहत लोगों को अपने घर में पड़े सोने को एक स्वर्ण खाते में जमा करा कर इससे ब्याज अर्जित करने का लाभ मिलेगा

विस्तार: उल्लेखनीय है कि स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (Gold Monetisation Scheme) की घोषणा वर्ष 2015-16 के केन्द्रीय बजट में की गई थी। केन्द्र सरकार की मंशा इसको लाकर गोल्ड डिपॉज़िट और गोल्ड मेटल लोन स्कीम को बंद करने की है। स्वर्ण मुद्रीकरण योजना में देश के नागरिकों तथा सुनारों को अपने पास पड़े सोने को एक मेटल खाते में जमा कर इसपर ब्याज कमाने का मौका दिया जायेगा। यादि जो सोना घर में लगभग व्यर्थ पड़ा है वो लोगों को कुछ कमा कर आय अर्जित करने का मौका देगा। इस योजना के तहत कम से कम 30 ग्राम सोना जमा कराने का प्रस्ताव है जिससे छोटे जमाकर्ताओं को भी आकर्षित किया जा सकता है। इसमें स्वर्ण किसी भी स्वरूप में हो सकता है जैसे सोने की सिल्ली, ईंट, बिस्कुट अथवा जेवर। खास बात यह है कि सोने से होने वाली इस आय पर कर लाभ भी मिलेगा। वहीं मियाद पूरी होने पर जमाकर्ताओं को अपना सोना वापस लेने अथवा इसके बदले नकद लेने का विकल्प मुहैया कराया जायेगा। योजना के तहत सोने को कम से कम एक साल के लिए जमा किया जा सकेगा और इसके बाद एक-एक वर्ष की समयावधि बढ़ाई जा सकेगी। उल्लेखनीय है कि 1999 में शुरू हुई गोल्ड डिपॉज़िट स्कीम को कोई खास सफलता नहीं मिली थी तथा इसके तहत मात्र 10 टन सोना एकत्र किया जा सका था।


7) केन्द्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा 17 मई 2015 को जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014-15 के दौरान भारत सरकार का राजकोषीय घाटा – Fiscal Deficit (अनुमानित) कितना रहा? – सकल घरेलू उत्पाद का 4% (4% of the GDP)

विस्तार: केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने 17 मई 2015 को घोषणा की उसने वर्ष 2014-15 के दौरान देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को सकल घरेलू उत्पाद के 4.1% के बजटीय अनुमान से भी नीचे लाने में सफलता हासिल की है तथा इस वर्ष यह सकल घरेलू उत्पाद का 4% रहा है। देश के राजकोषीय ढांचे को मजबूती प्रदान करने की दिशा में इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। वहीं वर्ष 2014-15 के दौरान देश का राजस्व घाटा (Revenue Deficit) सकल घरेलू उत्पाद का 2.8% रहा जबकि इसका बजटीय प्रावधान सकल घरेलू उत्पाद का 2.9% था। यदि इसकी वर्ष 2013-14 के सकल घरेलू उत्पाद के 3.2% के स्तर से तुलना की जाए तो यह निश्चित रूप से उल्लेखनीय प्रदर्शन है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष सत्ता पर काबिज होने वाली नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अपने पहले बजट में घोषणा की थी कि वह राजकोषीय घाटे के उसी लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास करेगी जिसे पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने अपने अंतरिम बजट में घोषित किया था। हालांकि उस समय सरकार ने यह भी कहा था कि इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। वहीं वर्ष 2015-16 के बजट में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3.9% के स्तर पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। उल्लेखनीय है कि राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) केन्द्र सरकार की आय और व्यय में होने वाला अंतर होता है जिसमें बजटीय व्यय बजटीय आय से अधिक होता है। वहीं राजस्व घाटा (Revenue Deficit) केन्द्र सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों और राजस्व व्यय के बीच विद्यमान अंतर होता है जिसमें राजस्व व्यय अधिक होता है।


8) राज्य सभा ने 13 मई 2015 को कम्पनी (संशोधन) विधेयक, 2014 (Companies (Amendment) Bill, 2014) को ध्वनि मत्र से पारित कर दिया। इस विधेयक को पारित किए जाने से 2013 के कम्पनी कानून (Companies Act, 2013) में कुल कितने संशोधन प्रभाव में आ गए? – सोलह

विस्तार: उल्लेखनीय है कि कम्पनी (संशोधन) विधेयक, 2014 को लोकसभा ने पिछले वर्ष (2014) में पारित कर दिया था। अब राज्यसभा द्वारा इस विधेयक को पारित किए जाने के बाद कम्पनी कानून 2013 में कुल 16 संशोधन प्रभाव में आ जायेंगे। ये 16 संशोधन तमाम विषयों से सम्बन्धित हैं जैसे कम्पनियों को बंद करना, जमानत सम्बन्धी प्रावधान, अवितरित लाभांश सम्बन्धित प्रावधान, कम्पनी बोर्ड में लिए गए निर्णयों की गोपनीयता सुनिश्चित करना, कम्पनी में किसी घोटाले में ऑडिटरों की भूमिका, इत्यादि।


9) 15 मई 2015 से भारतीय पूँजी बाजार (Indian capital markets) में भेदिया कारोबार (Insider Trading) के नए नियम लागू कर दिए गए। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इस विषय से सम्बन्धी पुराने नियमों को कब लागू किया था? – 1992 में

विस्तार: उल्लेखनीय है कि भारतीय पूँजी बाजार में अभी तक 1992 में SEBI द्वारा पहली बार लागू किए गए भेदिया कारोबारी नियम (Insider Trading Rules) लागू थे। लेकिन SEBI पिछले काफी समय से इस तथ्य से परिचित था कि पुराने नियम भारत में भेदिया कारोबार पर लगाम लगाने में प्रभावी सिद्ध नहीं हो रहे हैं। इसलिए जनवरी 2015 में उसने नए भेदिया कारोबारी नियमों (भेदिया कारोबार प्रतिबन्ध नियमन, 2015 – Prohibition of Insider Trading Regulations, 2015) की सूचना जारी कर दी थी तथा इसमें उल्लिखित नियमों को 15 मई 2015 से लागू कर दिया गया। भेदिया कारोबार में मुख्यत: कारोबार से सम्बन्धित महत्वपूर्ण अथवा संवेदनशील जानकारी (sensitive information) रखने वाला व्यक्ति अथवा समूह इस जानकारी का लाभ उठाकर इसे शेयर/पूँजी बाजार में अपने फायदे के लिए प्रयुक्त करता है। उदाहरण के लिए किसी कम्पनी के आगामी खराब वित्तीय परिणामों की जानकारी पहले से हासिल करने वाला व्यक्ति उक्त कम्पनी के शेयरों को पहले ही बेच कर बाद में सस्ते मूल्यों में हासिल कर सकता है जब इस जानकारी के सार्वजनिक होने के बाद शेयरों में गिरावट दर्ज हुई हो। भेदिया कारोबार को सख्त किया जाना इसलिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि किसी समय मुख्यत: छोटी कम्पनियों द्वारा प्रयुक्त इस प्रवृति का प्रयोग अब कुछ नामचीन कम्पनियाँ भी करने लगी हैं। भेदिया कारोबार सम्बन्धी नए नियमों में “भेदिया” शब्द की परिभाषा को विस्तृत करते हुए अब इसमें ऐसे लोगों को भी शामिल कर दिया गया है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी कम्पनी का हिस्सा न होने के बावजूद व्यवसाय तथा शेयर मूल्य, आदि को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा भी तमाम नए बदलाव किए गए हैं।


10) नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार को 13 मई 2015 को उस समय झटका जब एक वैश्विक वित्तीय समूह ने भारत की रेटिंग (Ratings) को घटा कर “अण्डरवेट” – Underweight (कमवजनी) श्रेणी का कर दिया। यह पिछले एक साल में पहला मौका है जब भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग को इस प्रकार से घटाया गया है। ऐसा करने वाला ये वित्तीय समूह कौन सा है? – एचएसबीसी (HSBC)

विस्तार: HSBC एक प्रमुख ब्रोकिंग फर्म है जो अर्थव्यवस्थाओं को रेटिंग भी प्रदान करती है। 13 मई को इसने भारत की रेटिंग को घटा कर “अण्डरवेट” श्रेणी में लाने की घोषणा कर दी। रेटिंग घटाने का यहाँ प्रतीकात्मक महत्व बहुत है क्योंकि नरेन्द्र मोदी द्वारा 26 मई 2014 को देश की बागडोर अपने हाथों में लेने के बाद यह पहला मौका है जब देश की वित्तीय रेटिंग इस तरह से घटाई गई है। ऐसा करने के लिए HSBC ने दलील दी है कि भारत एक बुरा मानसून झेलने जा रहा है, यहाँ कॉरपोरेट कम्पनियों के नतीजे लगातार बुरे आ रहे हैं तथा अब ब्याज दर को और घटाए जाने की कोई संभावना भी नहीं दिख रही है। HSBC ने यह भी कहा कि भारत में अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा किया गया निवेश इसकी क्षमता से अधिक हो गया है क्योंकि निवेशकों को भरोसा था कि मोदी सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों की तरफ कदम बढ़ाए जाने से यहाँ उनके निवेश पर अच्छा प्रतिफल मिलेगा। लेकिन अब ऐसे कोई चिह्न नहीं दिखाई दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि HSBC ने भारत की रेटिंग ऐसे समय में घटाई है जब भारतीय पूँजी बाजार समस्याओं से जूझ रहा है और अंतर्राष्ट्रीय निवेशक मैट (MAT) लगाए जाने, भूमि अधिग्रहण पर फंसे पेंच और GST को लगातार टाले जाने से सशंकित होकर निवेश से अपने हाथ खींच रहे हैं।


 

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