बैंकिंग एवं वित्तीय सचेतना – भाग 70

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12 Oct, 2014

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बैंकिंग जागरूकता,


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SBI-Share-split

1) भारत के सबसे बड़े वाणिज्यिक बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के शेयर को किस अनुपात में स्प्लिट (विभाजित) करने को बैंक के केन्द्रीय बोर्ड ने 24 सितम्बर 2014 को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी? – 1:10

विस्तार: 1:10 में विभाजित किए जाने का अर्थ हुआ कि SBI के एक शेयर को 10 भागों में बाँटा जायेगा। इसका तात्पर्य हुआ कि 10 रुपए फेस वैल्यू वाले एक शेयर की फेस वैल्यू को घटाकर 1 रुपए प्रति शेयर कर दिया जायेगा। ऐसा करने से बैंक के शेयर की खरीद फरोख्त करना खासकार छोटे निवेशक के लिए आसान हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि सितम्बर 2014 के दौरान ही पीएनबी (PNB) और ICICI बैंक ने भी अपने शेयर की फेस वैल्यू को घटाकर 1:5 अनुपात कर दिया है, जिसका अर्थ हुआ एक शेयर को 5 शेयरों में विभाजित किया जायेगा।

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2) भारतीय संघ के वे दो कौन से केन्द्र शासित प्रदेश हैं जिन्होंने 100% बैंकिंग कवरेज (पहुँच) हासिल की है जिसके बारे में 1 अक्टूबर 2014 को आयोजित वित्त मंत्रालय की एक बैठक में घोषणा की गई? – पुड्डुचेरी और चण्डीगढ़

विस्तार: पुड्डुचेरी और चण्डीगढ़ द्वारा 100% बैंकिंग कवरेज हासिल करने का अर्थ हुआ कि यहाँ के प्रत्येक परिवार के पास कम से कम एक बैंक खाता है। उल्लेखनीय है कि इन दोनों केन्द्र शासित प्रदेशों के बैंकिंग कवरेज की घोषणा उस बैठक में की गई जिसमें 28 अगस्त 2014 को शुरू प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) की समीक्षा की गई थी।

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3) अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स (S&)) ने सितम्बर 2014 के दौरान जारी भारतीय बैंकों के अपने दृष्टिकोण (outlook of Indian banks) में 11 बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों को नकारात्मक (negative) ने निकाल कर स्थिर (stable) श्रेणी में रख दिया है। लेकिन दो बैंकों के दृष्टिकोण को अभी भी नकारात्मक श्रेणी में रखा गया है। यह दो बैंक कौन से हैं? – इण्डियन ओवरसीज़ बैंक (IOB) और सिण्डिकेट बैंक

विस्तार: इण्डियन ओवरसीज़ बैंक और सिण्डिकेट बैंक को स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स द्वारा नकारात्मक श्रेणी में रखने का अर्थ हुआ कि इन दो बैंकों की परिसम्पत्तियों (assets) और पूँजी (capital) की गुणवत्ता निम्न कोटि की है। 11 बैंक तथा वित्तीय संस्थान जिनको एजेंसी ने नकारात्मक ने निकाल कर स्थिर श्रेणी में रखा है, हैं – ICICI बैंक, HDFC बैंक, एक्सिस बैंक, कोटक महिन्द्रा बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, बैंक ऑफ इण्डिया, IDBI बैंक, इण्डियन बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया, IDFC और कोटक महिन्द्रा प्राइम।

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4) एमसीएक्स स्टॉक एक्सचेंज (MCX-SX) का नया नाम क्या होगा जिसको सितम्बर 2014 के दौरान भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अपनी स्वीकृति प्रदान की? – मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इण्डिया (mSXI)

विस्तार: उल्लेखनीय है कि MCX-SX के बोर्ड ने कुछ माह पूर्व अपना नाम बदल करने के प्रस्ताव को अनुमोदित कर इसे स्वीकृति प्रदान कराने के लिए SEBI को भेजा था। स्टॉक एक्सचेंज का नाम बदलने के पीछे MCX-SX का मुख्य ध्येय है कि घोटालों के कारण चर्चा में आए अपने प्रमोटर फाइनेंशियल टैक्नोलॉजीज़ (FT) से अपने जुड़ाव को समाप्त करते हुए दिखाना चाहता है।

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5) अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग फर्म मूडीज़ (Moodys’) द्वारा सितम्बर 2014 के दौरान जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बेसल तृतीय स्तंभ (Basel III) के मानकों को वर्ष 2019 तक अपनाने के लिए वर्ष 2015 से लगभग कितनी धनराशि की आवश्यकता पड़ सकती है? – 1,50,000 करोड़ रुपए से 2,20,000 करोड़ रुपए तक (26 से 37 अरब डॉलर)

विस्तार: मूडीज़ द्वारा जारी इस रिपोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र से सम्बन्धित भारत के 11 प्रमुख बैंकों के लिए यह हिसाब लगाया गया है जोकि भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लगभग 62% ऋण पर नियंत्रण रखते हैं। उल्लेखनीय है कि बेसल तृतीय स्तम्भ के मानक में न्यूनतम पूँजी पर्याप्तता (minimum required capital) को टियर 1 के लिए बढ़ाकर 7% करने को कहा गया है जबकि कॉमन इक्विटी टियर 1 (CET1) के लिए पूँजी स्तर को 5.5% तय किया गया है। इसके अलावा बैंकों को लाभांश वितरण के लिए भी अतिरिक्त धन जुटाना पड़ेगा। यह भारतीय बैंकों के लिए एक बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है क्योंकि भारत में कम पूँजी बैंकों की एक अहम समस्या रही है।

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6) भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी चौथी द्वि-मासिक मौद्रिक नीति समीक्षा (4th Bi-monthly Monetary Policy review) 30 सितम्बर 2014 को प्रस्तुत की। इसमें आशाओं के अनुरूप एक बार फिर प्रमुख मौद्रिक दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है क्योंकि RBI अपना ध्यान मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने पर ही देना चाहता है। इस समीक्षा से निकली RBI के कुछ प्रमुख अनुमान और दरों की स्थिति क्या है?

– वर्तमान वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर (GDP growth rate) 5.5% रहने की संभावना

– वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2014) में हासिल तेजी दूसरी व तीसरी तिमाहियों में बरकरार न रहने की संभावना

– खुदरा मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर जनवरी 2015 में 8% तथा जनवरी 2016 में 6% रहने की संभावना

– रेपो दर 8% पर यथावत (अपरिवर्तित)

– कैश रिज़र्व रेशियो (CRR) 4% पर यथावत (अपरिवर्तित)

– वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) 22% पर यथावत (अपरिवर्तित)

– एक्सपोर्ट क्रेडिट रिफाइनेंस (ECR) सुविधा के तहत तरलता दर (liquidity ratio) को 32% से घटाकर 15% किया गया (10 अक्टूबर 2014 से प्रभावी)

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7) वित्त मंत्रालय द्वारा सितम्बर 2014 के दौरान की गई घोषणा के अनुसार देश की मौद्रिक नीति में बदलाव लाने के लिए तैयार किए जा रहे नए मौद्रिक नीति ढांचागत मसौदे (new Monetary Policy Framework Agreement) को किस तिथि तक हस्ताक्षरित कर स्वीकृत किए जाने की संभावना है? – 1 फरवरी 2015

विस्तार: देश की मौद्रिक नीति को तैयार करने में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए तैयार किए जा रहे मौद्रिक नीति के ढांचे से सम्बन्धित इस मसौदे को वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (Financial Sector Legislative Reforms Commission – FSLRC) तथा उर्जित पटेल समिति व वित्तीय क्षेत्र के सुधार से सम्बन्धित राजन समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। वर्तमान में वित्त मंत्रालय इस मसौदे पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की राय ले रहा है जिसके बाद इसे जनता के बीच रखकर अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा जायेगा। 1 फरवरी 2015 की तिथि को इसलिए घोषित किया गया है क्योंकि सरकार चाहती है कि वर्ष 2015-16 के आम बजट में यह दिखाया जा सके की पिछले बजट में की गई एक महत्वपूर्ण घोषणा को क्रियान्वित किया गया है। उल्लेखनीय है कि मौद्रिक नीति के ढांचे में सुधार से सम्बन्धित यह घोषणा केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 10 जुलाई 2014 को रखे गए अपने वर्ष 2014-14 के आम बजट में की थी।

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8) भारतीय पूँजी बाजार की नियामक संस्था SEBI ने सितम्बर 2014 के दौरान अपने एक कड़े आदेश के माध्यम से 13 कम्पनियों को अलग-अलग समयावधि के लिए पूँजी बाजार से अलग रहने को कहा। इन 13 कम्पनियों को यह कड़ा दण्ड क्यों सुनाया गया है? – इन कम्पनियों द्वारा ग्लोबल डिपॉज़िटरी रिसिप्ट्स (GDRs) में अनियमितताएं बरतने के आरोप में

विस्तार: SEBI द्वारा इस सम्बन्ध में कराई एक जाँच से यह तथ्य सामने आया कि यह इन 13 कम्पनियों ने GDR जारी करने वाली कम्पनियों के शेयरों में सक्रिय रूप से ट्रेडिंग कर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के उप-खातों का उपयोग इन शेयरों को भारतीय बाजार में बेचने में किया। ये 13 कम्पनियाँ हैं – बासमती सिक्योरिटीज़, अवध फाइनेंस एण्ड इन्वेस्टमेण्ट, एस.वी. इण्टरप्राइज़, अशोक पनचरिया, एम. गिरधारीलाल बुगुआलिया, इन्द्रा वरुण ट्रेड इम्पेक्स, डिलाइट फाइनेंशियल एडवाइज़र्स, विनोद अमृतलाल नाई, न्युजेन इंटरनेशनल, एक्सेल पेण्ट्स, चेरी कॉसमेटिक्स और एडल्विज़ एस्टेट।

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9) केन्द्र सरकार ने रेलवे बोर्ड के ढांचे में पुनर्सुधार करने के लिए सिफारिशें देने के लिए सितम्बर 2014 के दौरान एक समिति का गठन किया है। इस समिति का अध्यक्ष किसे बनाया गया है? – बिबेक देबरॉय (Bibek Debroy), प्रमुख अर्थशास्त्री

विस्तार: बिबेक देबरॉय देश के प्रमुख अर्थशास्त्री हैं और वर्तमान में सेण्टर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) के साथ जुड़े हैं। उनके नेतृत्व में गठित इस समिति का मुख्य कार्य ऐसे सुझाव प्रदान करने होगा जिससे रेलवे बोर्ड अधिक त्वरित गति से निर्णय ले सके। बोर्ड को अधिक कार्यकुशल और सक्षम बनाने के सम्बन्ध में भी समिति अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। इसके अलावा रेलवे के वित्तीय स्रोत बढ़ाने के बारे में भी समिति अपनी राय रखेगी। इस समिति के अन्य सदस्य हैं – गुरुदास दास, रवि नारायण (राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के भूतपूर्व CEO), के.एम. चन्द्रशेखर (पूर्व कैबिनेट सचिव), पार्थ मुखोपाध्याय (सेण्टर फॉर पॉलिसी रिसर्च) और राजेन्द्र कश्यप (रेलवे के भूतपूर्व वित्त आयुक्त)

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10) भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 25 सितम्बर 2014 को ट्राइब्यूनल (न्यायाधिकरण) स्थापित करने वाले किस कानून को समाप्त किए जाने सम्बन्धित एक अहम आदेश पारित किया? – राष्ट्रीय कर ट्राइब्यूनल कानून (National Tax Tribunal Act)

विस्तार: 25 सितम्बर को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक संवैधानिक पीठ ने अपना अहम आदेश सुनाते हुए कहा कि संसद किसी भी स्थिति में देश की न्यायापालिका की शक्तियों को हड़प नहीं सकती है और ऐसा किया जाने के लिए एक ऐसे न्यायाधिकरण (ट्राइब्यूनल) की स्थापना करना गलत है जिसकी प्रकृति न्यायालय से अलग है। अपना आदेश देते समय सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कर ट्राइब्यूनल कानून को गलत करार दिया जिसके तहत राष्ट्रीय कर ट्राइब्यूनल की स्थापना वर्ष 2005 में की गई थी। इस ट्राइब्यूनल की स्थापना कर (tax) सम्बन्धित मामलों की सुनवाई के लिए की गई थी तथा इसके तहत ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय के निर्णयों को अलग रखने का प्रावधान किया गया था। लेकिन इस कानून की प्रकृति को देखते हुए यह कानून उच्च न्यायालय के वादों में फँस गया था। बाद में इस मामले में अंतिम फैसला सुनाने के लिए इन मामलों को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया गया था। इस ट्राइब्यूनल की स्थापना को राष्ट्रीय ग्रीन ट्राइब्यूनल (National Green Tribunal – NGT) की तरह से करने की योजना बनाई गई थी।

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  1. Prakashbarthwal007 says:

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