बैंकिंग एवं वित्तीय सचेतना – भाग 100

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28 Sep, 2015

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बैंकिंग जागरूकता,


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interest-Rates-RBI-2015

1) भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1 सितम्बर 2015 को ब्याज दरों (interest rates) तथा आधार दरों (base rates) के निर्धारण के सम्बन्ध में अपने नए मसौदा दिशानिर्देशों (draft guidelines) को जारी कर दिया। इन दिशानिर्देशों में बैंकों द्वारा निर्धारित की जाने वाली ब्याज दरों में मुख्यत: क्या बड़ा परिवर्तन करने का प्रस्ताव रखा गया है? – पूरे बैंकिंग क्षेत्र में एक यूनीफॉर्म ब्याज दर निर्धारण पद्धति अपनाई जाय

विस्तार: RBI ने अपने मसौदा दिशानिर्देशों में मुख्यत: बैंकों को अपनी ब्याज दर निर्धारित करने के लिए मार्जिनल-कॉस्ट-ऑफ-फण्ड आधारित पद्धति (marginal-cost-of-funds-based system) अपनाने की वकालत की गई है। माना जा रहा है कि इस पद्धति को अपनाने से बैंकों की आधार-दरों में कुछ नरमी आ सकती है। इसके अलावा ऐसा किए जाने से जमा तथा उधारी दरों में किए जाने वाले परिवर्तनों को जल्दी कार्यान्वित किया जा सकेगा। वहीं इससे बैंकों को अपनी ब्याज दर निर्धारित करने में मिलने वाली स्वतंत्रता में कुछ बाधा आने की संभावना भी है। RBI ने इस नई पद्धति को अपनाने के लिए 1 अप्रैल 2016 की समयावधि तय की है। इससे बैंकों को इस नई पद्धति को समझने तथा इसे कार्यान्वित करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा। वहीं बैंकों को इन दिशानिर्देशों से सम्बन्धित अंतिम सर्कुलर जारी होने के दो माह के भीतर एक स्पष्ट रोडमैप भेजना होगा जिसमें इस नई पद्धति को अपनाने में लगने वाली समयसीमा को स्पष्ट करना होगा। आरबीआई ने 15 सितम्बर 2015 अथवा इससे पहले इन मसौदा दिशानिर्देशों पर सम्बन्धित पक्षों की राय मांगी है।


2) हाल ही में जारी की गई वर्ष 2014-15 की RBI की वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report 2014-15) में यह तथ्य प्रस्तुत किया गया है वित्तीय संकटों के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले RBI के आपातकालीन कोष (Contingency Fund) की वर्तमान मात्रा गिर कर उसकी कुल परिसम्पत्तियों की मात्र 8.4% रह गई है। इसके अलावा RBI ने पिछले दो सालों में इस कोष में और धन हस्तांतरित भी नहीं किया है। इस कोष का तय न्यूनतम मानक क्या है? – परिसम्पत्तियों का 12%

विस्तार: उल्लेखनीय है कि परिसम्पत्ति विकास कोष (Asset Development Fund) नामक इस आपातकालीन कोष में वर्ष 2012-13 में कुल मात्रा जहाँ 2,424 अरब रुपए थी वहीं वर्ष 2014-15 में इसका कुल आकार 2,434 अरब रुपए था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस कोष में पिछले दो सालों में नया हस्तांतरित किया गया धन न के बराबर ही है। इस रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि वर्तमान में RBI अपने मुनाफे में से अपने लिए लगभग कुछ भी न रखकर केन्द्र सरकार को इस राशि में से 99.9% राशि हस्तांतरित कर देता है। वर्ष 2010-13 में केन्द्रीय बैंक अपने लाभ का मात्र 40 से 50% तक हिस्सा केन्द्र सरकार को हस्तांतरित करता था। वहीं वर्ष 2014-15 में सरकार को RBI से प्राप्त लाभांश 659 अरब रुपए है जोकि वर्ष 2010-11 की 150 अरब रुपए की राशि से कहीं अधिक है।


3) केन्द्रीय कैबिनेट (Union Cabinet) ने देश में व्हाइट लेबल एटीएम (White Label ATMs) के संचालन से सम्बन्धित क्या महत्वपूर्ण घोषणा 9 सितम्बर 2015 को की? – उसने व्हाइट लेबल एटीएम के संचालन के लिए ऑटोमैटिक रूट के जरिए 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को मंजूरी प्रदान कर दी

विस्तार: उल्लेखनीय है कि व्हाइट लेबल एटीएम को संचालित करने का काम गैर-बैंकिंग कम्पनियों (non-banking companies) को सौंपा गया है जो अपने ब्राण्डों के नाम से इन ATM श्रॄंखला का संचालन करती है। अभी तक व्हाइट लेबल एटीएम में विदेशी निवेश को सरकारी स्वीकृति के द्वारा ही अनुमति मिलती थी तथा इसमें ऑटोमैटिक रूट की व्यवस्था नहीं थी। इसके चलते व्हाइट लेबल एटीएम की परियोजना को स्वीकृति मिलने में काफी समय लग रहा था। अब ऑटोमैटिक रूट के 100% FDI से इससे सरकार के वित्तीय समावेशन (financial inclusion) प्रयास को अधिक बल मिलेगा। इससे सरकार को ग्रामीण तथा अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में ATM नेटवर्क को अधिक मजबूत करने में मदद मिलने का अनुमान है।


4) वित्तीय उत्पादों (financial products) के वितरण लाभों को विवेकीकृत करने तथा ऐसे उत्पादों को बेचने के लिए अपनाई गए गलत तरीकों (mis-selling) पर रोक लगाने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में वित्तीय उत्पादों से एक्ज़िट (exit)  करने के लिए एक लचीला तरीका तैयार करने की सिफारिश की है। इसके अलावा इन उत्पादों से एक्ज़िट करने के समय निवेशक से वसूले जाने वाले चार्जेज़ से होने वाला लाभ वित्तीय उत्पादों को बेचने वाली कम्पनियों के खाते में न डालने की सिफारिश भी की है। इस समिति का अध्यक्ष कौन है? – सुमित बोस, पूर्व वित्त सचिव

विस्तार: सुमित बोस (Sumit Bose) की अध्यक्षता वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि पेंशन सम्बन्धी उत्पादों को छोड़कर अन्य सभी वित्तीय उत्पादों से बाहर निकलने का निर्णय निवेशकों के जिम्मे ही रहना चाहिए। इसके अलावा इन उत्पादों से निवेशक के बाहर निकलने के तरीके को अधिकाधिक लचीला बनाया जाय और इस पर लगाए जाने वाले चार्जेज़ को कम से कम रखा जाय। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में यूनिट लिंक्ड बीमा योजनाओं (ULIPs) में कम से कम पाँच साल के लॉक इन पीरियड (lock-in period) का प्रावधान है। ये पहले तीन साल का था लेकिन लेकिन सितम्बर 2010 में इसे तब बढ़ा दिया गया था जब खराब प्रदर्शन के चलते भारी संख्या में निवेशकों ने इन उत्पादों से अपने आपको बाहर कर लिया था।


5) केन्द्रीय कैबिनेट (Union Cabinet) ने 9 सितम्बर 2015 को गोल्ड मोनेटाइज़ेशन योजना (Gold Monetisation Scheme) को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी जिसके अंतर्गत लोग अपने स्वर्ण (सोने) को बैंक में जमा कर ब्याज कमा सकेंगे। इस योजना के पीछे केन्द्र सरकार की मुख्य सोच है? – घरों की तिजोरियों तथा लॉकरों में पड़े सोने को उपयोगी बनाना तथा इसे अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाना

विस्तार: गोल्ड मोनेटाइज़ेशन योजना (Gold Monetisation Scheme) के द्वारा केन्द्र सरकार मुख्य रूप से यह सोच रखती है कि घरों तथा तिजोरियों में लगभग 20,000 टन सोने को कुछ उपयोगी गतिविधि में लगाया जाय तथा इसे किसी आर्थिक उपयोगी गतिविधि का हिस्सा बनाया जाय। ऐसा इसलिए है क्योंकि घरों में तथा बैंकों के लॉकरों में पड़ा यह धन कोई आर्थिक गतिविधि में नहीं लगा है। इस योजना के तहत भारतीय नागरिक किसी भी स्वरूप (any form of gold) में अपने पास रखे सोने को बैंकों में 1 से 15 साल की मियाद के लिए जमा करा सकेंगे तथा इसके एवज में ब्याज अर्जित कर सकेंगे। मियाद पूरी होने पर यह बैंक जमा किए गए सोने की मात्रा के तब के बाजार भाव के बराबर मूल्य जमाकर्ता को चुका देगा। वहीं बैंक इस जमा सोने को स्वर्णकारों को बेच सकेंगे जिससे सोने की घरेलू आपूर्ति को सुचारू करते हुए सोने के आयात बिल को कम किया जा सकेगा। हालांकि सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस योजना को काले धन को सफेद में बदलने का उपागम नहीं बनने दिया जायेगा तथा सोने पर तथा इससे अर्जित किए जाने वाले ब्याज पर नियत दरों के अनुसार कर (tax) लगाया जायेगा। उल्लेखनीय है कि गोल्ड मोनेटाइज़ेशन योजना के बारे में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2015-16 के केन्द्रीय बजट में प्रावधान किया था जबकि योजना से सम्बन्धित मसौदा प्रस्ताव 19 मई 2015 को जारी किया गया था।


6) केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा 9 सितम्बर 2015 को स्वीकृत सॉवरिन गोल्ड बाण्ड स्कीम (Sovereign Gold Bond Scheme) का मुख्य उद्देश्य क्या है? – स्वर्ण (सोने) को एक निवेश के रूप में देखने वाले ग्राहकों को आकर्षित कर निवेश हासिल करना

विस्तार: केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत सॉवरिन गोल्ड बाण्ड स्कीम (Sovereign Gold Bond Scheme) के तहत ऐसे लोगों को आकर्षित करने का प्रयास किया जायेगा जो सोने को एक भरोसेमंद निवेश विकल्प के रूप में देखते हैं। इसके तहत निवेशकों को वास्तविक सोना ने बेचकर अपेक्षित सोने की मात्रा के बराबर मूल्य का निवेश स्वर्ण बाण्डों में कराया जायेगा। यह बाण्ड विभिन्न भार कीमतों के होंगे – 5 ग्राम, 10 ग्राम, 50 ग्राम और 100 ग्राम। इन बाण्डों को पाँच से सात साल की समयावधि के लिए जारी किया जायेगा तथा इसपर ब्याज दर का निर्धारण निवेश के समय सोने की कीमतों को ध्यान में रखकर किया जायेगा। हालांकि, योजना के तहत एक व्यक्ति अधिकतम 500 ग्राम स्वर्ण बाण्डों को खरीद सकेगा। योजना सभी भारतीय नागरिकों तथा संस्थाओं के लिए मान्य होगी।


7) पूरे देश में एक ही कार्ड से विभिन्न मेट्रो रेल नेटवर्क सेवाओं तथा ऐसी ही अन्य सेवाओं का लाभ उठाने की एक महात्वाकांक्षी योजना के तहत केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय (Ministry of Urban Development) ने स्मार्ट नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (National Common Mobility Card – NCMC) के मॉडल की अवधारणा प्रस्तुत की है। इस मॉडल पर आधारित कार्ड को देश भर की प्रमुख यातायात प्रणालियों के संचालकों द्वारा प्रयुक्त किया जा सकेगा। इस कार्ड से सम्बन्धित भुगतान प्रणाली को विकसित करने का काम किसे सौंपने का सरकार ने मन बनाया है? – नेशनल पेमेण्ट्स कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (National Payments Corporation of India – NPCI)

विस्तार: सरकार द्वारा प्रस्तावित नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) के द्वारा मुख्यत: देश भर की मेट्रो प्रणालियों की सेवाओं का प्रयोग किया जा सकेगा जबकि आगे इसे खुदरा भुगतान (retail payments) तथा अन्य खरीद सेवाओं के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि वैश्विक पटल पर अभी सिंगापुर (Singapore) को छोड़कर किसी अन्य देश में ऐसे कार्ड की अवधारणा प्रयोग में नहीं है तथा सिंगापुर में भी इसका प्रयोग सिर्फ एक शहर की विभिन्न यातायात सेवाओं के लिए है। इसलिए सरकार द्वारा रखे गए कार्ड मॉडल को सबसे आधुनिक तथा क्रांतिकारी मॉडल कहा जा सकता है। इस प्रस्तावित कार्ड की भुगतान सम्बन्धी जटिल प्रणालियों तथा इससे सम्बन्धित अन्य तमाम पक्षों को स्थापित करने का जिम्मा सरकार ने नेशनल पेमेण्ट्स कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया (NPCI) को सौंपा है।


8) अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स (Standard & Poor’s) ने एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में किस प्रमुख लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) अर्थव्यवस्था की साख (क्रेडिट रेटिंग) को गिराकर “जंक” श्रेणी (junk grade) का करने की घोषणा 9 सितम्बर 2015 को की जिससे मंदी झेल रही इस अर्थव्यवस्था में एक बड़ा भूचाल आ गया? – ब्राज़ील (Brazil)

विस्तार: S&P द्वारा ब्राज़ील की क्रेडिट रेटिंग (साख) को इन्वेस्टमेण्ट श्रेणी (investment grade) से गिराकर जंक श्रेणी (junk grade) का किए जाने से राष्ट्रपति डिल्मा रॉसेफ (Dilma Rousseff) के देश को मंदी के चंगुल से निकालकर दोबारा निवेशकों के भरोसे पर खरा उतरने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा है। ब्राज़ील दक्षिण अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तथा वर्तमान में मंदी (Recession) के दौर से गुज़र रही है। उल्लेखनीय है कि लगभग एक माह पूर्व एक और रेटिंग एजेंसी मूडीज़ (Moody’s) ने भी ब्राज़ील की रेटिंग को घटाया था लेकिन इसे जंक श्रेणी से थोड़ा ऊपर रखते हुए कहा था कि ब्राज़ील अभी भी निवेश के लिए उपयुक्त है। वहीं इस डाउनग्रेड के बारे में S&P ने स्पष्ट किया कि ऐसा देश में खराब होती राजनीतिक स्थिति तथा इसके आर्थिक नीतियों पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव के चलते किया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दशकों की वित्तीय अस्थिरता के बाद जब कुछ वर्ष पूर्व S&P ने ब्राज़ील की रेटिंग को इन्वेस्टमेण्ट श्रेणी का बताया था तब देश को विकासशील देशों में एक उभरता हुआ सितारा माना जा रहा था। लेकिन वर्ष 2011 में डिल्मा रॉसेफ द्वारा राष्ट्रपति का पद ग्रहण किए जाने के बाद से देश पर मंदी हावी होती गई और पिछली तिमाही के दौरान देश आधिकारिक रूप से मंदी के भंवर जाल में फँस गया।


9) विश्व बैंक ने 14 सितम्बर 2015 को व्यवसाय करने में आसानी से सम्बन्धित भारतीय राज्यों की अपनी तरह की पहली रैंकिंग सूची जारी की। इस सूची में राज्यों को जनवरी से जून 2015 की समयावधि के दौरान “ईज़ ऑफ डुइंग बिजनेस” (‘ease of doing business’) नीति के अनुपालन के आधार पर स्थान दिया गया है। सूची में कौन सा राज्य पहले स्थान पर है? – गुजरात (Gujarat)

विस्तार: इस रैंकिंग सूची के अनुसार गुजरात ने “ईज़ ऑफ डुइंग बिजनेस” से सम्बन्धित 71.15% सुधारों पर अमल किया। इसके बाद आन्ध्र प्रदेश का स्थान था जो 70.12% के स्कोर के साथ गुजरात से थोड़ा सा ही पीछे था। आन्ध्र प्रदेश के बाद क्रमश: झारखण्ड (63.09%), छत्तीसगढ़ (62.45%) और मध्य प्रदेश (62%) का स्थान था। वहीं विदेशों से सर्वाधिक निवेश हासिल करने वाले दो राज्य – महाराष्ट्र और तमिलनाडु का स्थान क्रमश: आठवाँ और बारहवाँ रहा तथा उनके स्कोर 50% से कम रहे। उल्लेखनीय है कि इस रैंकिंग को तैयार करने के लिए विदेशों निवेशकों के बजाय इन राज्यों में व्यवसाय में संलग्न छोटे तथा मझोले उपक्रमों द्वारा “ईज़ ऑफ डुइंग बिजनेस” के बारे में महसूस की गई स्थिति को बयान किया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राज्यों को “ईज़ ऑफ डुइंग बिजनेस” की परिपाटी पर रैंक प्रदान करने का निर्णय दिसम्बर 2014 के दौरान “मेक इन इण्डिया” कार्यशाला में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राज्य के मुख्य सचिवों के साथ हुए विचार-विमर्श में लिया गया था।


10) भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा 14 सितम्बर 2015 को की गई घोषणा के अनुसार उसने हाल ही में सहारा समूह (Sahara Group) से सम्बन्धित किस गैर-बैंकिंग फाइनेंस कम्पनी (NBFC) का पंजीकरण रद्द कर दिया है? – सहारा इण्डिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड (SIFCL)

विस्तार: आरबीआई ने सहारा इण्डिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड (SIFCL) का एक गैर-बैंकिंग फाइनेंस कम्पनी (NBFC) के रूप में कार्य करने का पंजीकरण 3 सितम्बर 2015 से रद्द कर दिया है। यह कदम आरबीआई कानून (RBI Act) के प्रावधानों के तहत उठाया गया है। इसके चलते अब यह कम्पनी गैर-बैंकिंग फाइनेंस कम्पनी की परिधि में आने वाला कोई भी संचालन नहीं कर सकती है। उल्लेखनीय है कि जून 2008 में ही RBI ने SIFCL द्वारा जनता से पैसा एकत्र करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। RBI के द्वारा इस सम्बन्ध में जारी जानकारी के अनुसार की गई जाँच में पाया गया था कि SIFCL ने अपने परिचालन के दौरान लगातार केवाईसी (KYC) नियमों की अनदेखी की। इसके अलावा इसने परिसम्पत्ति तथा देयता सम्बन्धी प्रबन्धन (asset-liability management) तथा अपने निवेश (investment) में भी कई बार अनियमितताएं बरतीं। SIFCL का एक गैर-बैंकिंग फाइनेंस कम्पनी के रूप में पंजीकरण दिसम्बर 1998 में लखनऊ में किया गया था।


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